टिटहरी और उसका आसमान (Titaharee aur Uskaa Aasmaan)- Vyangy


व्यंग्य                                                                टिटहरी और उसका आसमान
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टिटहरी आसमान की ओर पैर करके लेटी है। जनता या पाठकों से उसका दावा है, तीन जिम्मेदारियाँ निभाने का। पहली, पाठकों को शिक्षित करना, दूसरी, सामाजिक सरोकार और तीसरी सूचना रंजन यानी इन्फोटेन्मेंण्ट। लेकिन अभी क्या है कि ये जो ऊपर आसमान है ना, ये नीचे टपकने वाला है। इसलिए चिडि़या ने अपने दोनों पैर ऊपर कर लिए हैं। लेटी हुई चिडि़या पाठकों को आश्वस्त कर रही है, ‘‘आप चिन्ता न करें, ये मेरी पर्सनल प्रॉब्लम है, आसमान गिरेगा तो मैं सम्हाल लूँगी।’’

लोग या पाठक उसकी बात पर भरोसा करते भी हैं। तो चिडि़या लेटी है, कुछ देर बाद उद्योगपति आकर बोलता है, ‘‘मैडम, ध्यान रखना, आपका ये आसमान हमारी इण्डस्ट्री पर न गिरे, बदले में आपके दोनों पैरों के बीच वह जो बादलवाला टुकड़ा है, इसमें से बीस-तीन की जगह हमारे एड के लिए बुक कर लीजिए।’’

चिडि़या बुक कर लेती है। पेट का सवाल है। माफिया हेड आता है। कहता है, ‘‘अच्छा काम कर रही हैं आप। बस, ये आसमान हम पर न गिरे, ध्यान रखना। भले हमारा नाम मत छापना, किसी के सामने स्वीकार मत करना कि आप हमसे मदद लेती हैं। पर ये थोड़े से पत्रम-पुष्पम हैं, विथ बेस्ट कॉम्प्लीमेंट सम्हाल लीजिए इसे।’’

फिर नेता आता है, फिर वही बातें, ‘‘आसमान जब गिरे तो हमारा ध्यान रखना। खास तौर से चुनाव में हमारे समर्थन की सशुल्क-खबरों से इस आसमान को ढाँके रखना। देखना हाँ।’’

ऐसे ही किसी समय सरकार भी आसमान की ओर पैर उठाए चिडि़या के पास चली आती है। शर्त वही है, ‘‘थोड़ा बहुत नाटक भले ही करो, पर हमारे मुख्यमन्त्री, हमारे मन्त्रियों को आसमान में प्रोजेक्ट करती रहो। ध्यान रखना, ये यहाँ से वहाँ तक का आसमान हमने बुक किया है, यहाँ नीचे हमारा स्क्रोल चलना चाहिए। इसी की आड़ में हमारी लापरवाही, हमारे काण्ड दबाती रहो।’’

सुबह होती है। पाठक सन्तुष्ट है, टिटहरी ने आसमान को गिरने से रोक लिया। पर कुछ समय बाद जनता महसूस करती है, ये चिडि़या तो आसमान की स्पेस-बुकिंग में ही व्यस्त है। ये चिडि़या जिस आसमान को गिरने से रोकने का दावा कर रही है, ये तो खुद उसी आसमान का हिस्सा बन चुकी है। अपने आसपास माफिया टाइप जो भी कुछ है, इस चिडि़या की उससे हिस्सेदारी है। शहर में दवा माफिया, अस्पताल माफिया है, चिडि़या का उसमें हिस्सा है, भू-माफिया है, चिडि़या का हिस्सा है, खनन माफिया है, चिडि़या का हिस्सा है। शराब माफिया है, चिडि़या का हिस्सा है। धार्मिक माफिया है, तो चिडि़या का उसमें भी हिस्सा है। वो तो गनीमत है कि बलात्कार, डकैती, लूट, हत्या करनेवालों का इसे पहले से पता नहीं होता, अगर होता होगा, तो निश्चित मानिए, इस चिडि़या की उनसे हिस्सेदारी होती। 

एक समय था, सरकार इस चिडि़या के जरा से टिटियाने पर चमक जाती थी, अपने गलत फैसले वापस लेती थी। अब इसके टिटियाने पर थोड़ा सा चुग्गा डाल देती है। मुस्कुराकर कहती है, ‘‘पिंजरे में बन्द टिटहरी चहको। अच्छा लगता है, जब तुम हमारे लिए गाली गाती हो। तुम्हारे इस गीत से लोकतन्त्र की रक्षा जैसा कुछ होता है। शाब्बाश!’’

आज सरकार को, नेता को, माफिया-गुण्डों को, इस आसमान पैरों पर उठा सकने वाली टिटहरी का कितना डर है, आप-हम सब जानते हैं, लेकिन असली डर तो यह है कि जिस दिन पाठक इसकी असलीयत जान लेगा, तो क्या होगा? असल में चिडि़या को असली खतरा आसमान से नहीं, उन बड़ी बिल्लियों से है, जो उसकी ओर झपटने की तैयारी कर रही हैं। लेकिन टिटहरी बेखबर है। मेरा जुड़ाव इस टिटहरी से पिछले 46 साल से है, इसलिए प्रार्थना कर रहा हूँ, ‘‘ऐ टिटहरी, नाटक करना बन्द कर। सम्हाल खुद को, नहीं तो . . ।’’

नहीं तो, हम देखेंगे कि बिल्ली टिटहरी को पूरा निगल जाएगी। फिर जमीन पर यों चारों पैर ऊपर करके लेट जाएगी और कहेगी, ‘‘पाठकों, वो जो टिटहरी थी, वो अब मुझमें समाहित है, लेकिन आप लोग निश्चिन्त रहें, आसमान गिरेगा, तो मैं सम्हाल लूँगी।’’- रोमेश जोशी
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डॉन का चुनाव घोषणा पत्र (don Ka Chunavi Ghoshanaa Patr


‘‘सब एक से बढ़कर एक घोषणा कर रहे हैं, ऐसे में आप क्या वादे करेंगे?’’ मैंने डॉन से सीधा सवाल कर डाला और तत्काल डॉनोचित जवाब मिला, ‘‘देखिए, झूठ बोलने या आसमानी-सुलतानी वादे करने की हमें कोई जरूरत नहीं है। हम तो अपने वोटर से सीधी और दो टप्पी बात करेंगे।’’
डॉन ने मुझे चुनाव घोषण पत्र तैयार करने के लिए अर्जेण्ट में बुलाया था। इस मामले में काफी लेट हो गए थे वे। देर तक वे बताते रहे कि कहाँ-कहाँ, उनके कितने लोग टिकिट उठाकर उम्मीदवार बन गए हैं और अब उनकी जरूरतों को पूरा करने में कैसे दम फूल रहा है, ‘‘ साले, डिमाण्ड भेज देते हैं और ये नहीं बताते कि देसी कितनी और अंग्रेजी कितनी? ’’
‘‘लेकिन घोषणा पत्र में यही होता है। पार्टी वोटर को बताती है कि उसके प्रत्याशी जीत गए तो क्या-क्या होने वाला है। आपको भी कुछ तो वादे करने ही पड़ेंगे। बताना पड़ेगा कि आपके प्रत्याशी दूसरों से डिफरेण्ट क्यों हैं और जीत गए तो क्या करेंगे? ’’ मैंने डॉन के समक्ष अपेक्षित अपरिहार्य विनम्रता के साथ स्थिति स्पष्ट करने का पूरा प्रयास किया। इस बार उत्तर तत्काल नहीं मिला। कुछ देर सोचकर उन्होंने डॉन-सुलभ सादगी के साथ कहा, ‘‘ आप अपने हिसाब से वो क्या बोलते हैं, हिन्दी में लिख लेना। सबसे पहले तो घोषणा पत्र में वोटर को ये याद दिला दीजिए कि किसी भी पार्टी के टिकिट से जीते, हमारा आदमी तो सरकार बनाने वालों के करीब ही रहेगा और उसके कहने पर मन्त्रियों को और अफसरों को भी काम करने ही होंगे। इसलिए वोटर अगर अपने काम करवाना चाहता है, तो हमारे आदमी को वोट दे। ’’
इस बात को घोषणा पत्र में किस तरह लिखा जाएगा, यह सोचते हुए मैं अगला मुद्दा सुनने लगा। उन्होंने आगे कहा, ‘‘ वोटर अगर चाहता है कि माफिया दल का एक दमदार सदस्य अपने अपराधी और गुण्डे साथियों के साथ क्षेत्र से बाहर चला जाए, तो वह हमारे उम्मीदवार को चुने और पाँच साल के लिए राजधानी भेज दे। असल में वोटर के हाथ में उसे सुधारने का यह सुनहरा मौका है। हो सकता है, पाँच साल बाद वह लौटे तो वह इतना सुधर जाए कि जनता को तंग करना बन्द कर दे। वैसे भी इन वर्षों में वह इतना मजबूत तो आर्थिक रूप से हो ही जाएगा कि एकदम गरीब आदमी को तंग करना उसे ओछापन लगे।’’
‘‘हम यह वादा भी करना चाहते हैं कि हर क्षेत्र में जो अपराध सबसे ज्यादा होता होगा, पूरे पाँच साल तक उस अपराध की संख्या में पचास प्रतिशत से ज्यादा की कमी रहेगी।’’ डॉन भाई के स्वर में अब कुछ मानवता का पुट आ गया। मुझे असमंजस में देख उन्होंने समझाया, ‘‘जैसे किसी क्षेत्र में पाँच साल में पाँच हजार बलात्कार होते हैं या आठ हजार अपहरण होते हैं, तो हमारे आदमी का वादा रहेगा कि बलात्कार ढाई हजार से ज्यादा और अपहरण चार हजार से ज्यादा नहीं होंगे। और किसी अनाधिकृत व्यक्ति ने बलात्कार या अपहरण किया तो उसे कड़ी सजा दिलाने में भी हमारे आदमी की टीम पूरा सहयोग करेगी। ’’
यहाँ आकर मैंने डॉन को याद दिलाया कि अगर घोषणा पत्र में भ्रष्टाचार, कुशासन आदि के विरुद्ध कुछ नहीं कहा जाएगा, तो दमदार होकर भी सब अधूरा सा लगेगा। इस मुद्दे पर भी कुछ तो होना चाहिए। जवाब में गालीदार भाषा का जो रेला चला उसे नोट करते हुए मुझे लग रहा था कि यह सब संसदीय भाषा में अनुवाद करने में मेरी प्रतिभा की परीक्षा होने वाली है। और भी जो प्रश्न मैंने सामने रखे, डॉन-शैली में यथातथ्य उत्तर मुझे मिल गए।
मैं महसूस कर रहा था कि डॉन-श्री वोटर से सीधी बात करने के वादे पर कायम थे। अन्य घोषणा पत्रों से बिलकुल अलग वोटर के फायदे की जो बातें वे कह रहे थे, उन पर एकबारगी विश्वास किया जा सकता था और उन्हें पूरा करना भी बहुत मुश्किल नहीं था। फिर भी घोषणा पत्र तो घोषणा पत्र है, कह नहीं सकते कि वोटर के समर्थन से माफिया-टीम के काफी सदस्य यदि जीत गए, तो डॉन महोदय पर भी राजनीतिक रंग नहीं चढ़ेगा और वे घोषणा पत्र में लिखने के लिए बताए गए वादों पर कायम रहेंगे या नहीं। यह भी सोच रहा हूँ कि लोगों को अन्य पार्टियों की तुलना में यह घोषणा पत्र बेहतर लगेगा या नहीं। अभी तो धाँसू शब्दावली में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। अन्य घोषणा पत्रों जैसा व्यवहार न करते हुए, अगर आप इस माफिया डॉन घोषणा पत्र को पढ़ लें, तो बताइएगा, कैसा लगा? - रोमेश-जोशी

गिरफ्तारी तो आज करा दें पर (Giraftaari to Aaj Karaa den)


माना कि मर्डर केस है, कोर्ट इसे आपकी नाकामी और साजिश दोनों मान रही है, पर आप विश्वास रखो भाई, गिरफ्तारी हो जाएगी। गिरफ्तारी तो होना ही है। ऐसे पूरी जिंदगी फरारी में थ़ोडे ना काटेंगे। घरबार है, फेमेली है, धंधारोजगार है। पॉलिटिकल कैरियर भी है। और अब तो चर्चा में आने से आगे चांसेज ब़ढ गए है। सब है। आप बोलोगे, तब गिरफ्तारी करवा देंगे या फिर जब हम चाहेंगे, तब हो जाएगी। याद है ना, आपको यहां कौन लाया ? मैं लाया ना ? आप मानो तो, जहां चाहोगे वहां सरेंडर करवा देंगे । सब प्लानिंग से होगा, होना चाहिए या नहीं ? आप जानते नहीं क्या ? अपने एक इशारे में जो बोलो सो काम होते हैं। अरे, आप बोलो तो एक बार, पार्टी के अन्दर से दस आरोपी सरेंडर करने को बल्कि गिरफ्तार होने को भी तैयार हो जाएं। एक मिनट में और एक इशारे पर। आप बोलो तो। आप बस, बता देना, इशारा भर कर देना कि अब हद पार होने वाली है। मतलब समझ रहे हो ना, हद पार होने का ? अपन वारंट की तामिली भी करवा देंगे और सरेंडरफरेंडर भी, चिन्ता नहीं, क्या ?



आपका तो क्या है कि आप बस पुलिस की नजर से देख रहे हो मामले को। आपको कोर्ट की ओैर केस की तारीख की प़डी है, बस। पर अपने को तो सारे एंगल देखने प़डते हैं। मर्डर का केस है, तो क्या हुआ, पार्टी इतने महत्वपूर्ण नेता का साथ छ़ोड दें ? बल्कि इस मारे और भी सीरियस होकर देखना प़डता है। पार्टी की इमेज को भी देखना प़डता है ना ? सब सोचसमझकर करना प़डेगा। आप लोगों को उनकी हवा तक नहीं लग पाई अब तक और अपन ने इस्तीफा भी बुलवा लिए, धीरे से। यानी समझ गए ना, सब अपने कंट्रोल में है। हंसो मत, आप जहां सोच रहे हो, अब वहां नहीं हैं। किसी को हवा नहीं लगने दी और हटा दिए।
वो तो क्या है कि आसपास चुनाव नहीं हैं, नहीं तो ऐसी परिस्थिति में यह जनता भी अपनी। पर एरिया के वोटरों का ध्यान तो रखना ही प़डेगा ना। फिर पूरे इलाके में भी और आसपास भी उनकी जाति के कितने वोट हैं ? आपको पता नहीं है, पर हमें तो सब सोचना प़डता है। आपके जैसा नहीं है। मर्डर में इन्वाल्व हो गए तो क्या हुआ, कार्यकर्ताओं पर उनका कितना तग़डा होल्ड हो। आप तो जानते ही हैं। पूरे एरिया में घूम आइए, लोगों ने अपनी आंखों सब देखा है, पर केस में कोई गवाही देने को तैयार हो जाए तो कहना। पार्टी का अंदरुनी मामला है, इसलिए विरोधी तो खेर चुप हैं, पर असल परेशानी को पार्टी के अपने गुटों की है। सब अपने दांव चलाना चाहते हैं,ऐसे में आप समझ लो, गिरफ्तारी करवाई कि सब श्रेय लेने भ़िड जाएंगे। टूट प़डेंगे। राजधानी तो छ़ोड, दिल्ली तक जवाब देना प़ड जाएगा।
अभी गिरफ्तारी नहीं करवाने का सबसे ब़डा कारण तो आपको बताया ही नहीं। ये समझ लो कि आपने गिरफ्तार किया नहीं कि फिर सब कुछ आपके कब्जे में। हेंहें, और वही तो हम होने नहीं देना चाहते। अपनी पार्टी की सरकार है भाई, ऐसा कैसे होने दें ? इसीलिए गिरफ्तार होने के बाद इम्मिजिएट अस्पताल में शिफ्ट करने का पक्का इंतजाम होने के बाद ही, अब आप समझ लो कि कुछ भी होगा।
वाह ! ऐसे कैसे मान लें आपकी बात। ये तो हमें पता है कि रिमांड पर लेने के बाद भी आप उनको उंगली नहीं लगा पाएंगे। दम हो जो लगाएं ! चैलेंज। बात वो है ही नहीं । आप इसको यों समझ लो, मर्डर केस में अपनी पार्टी के आरोपी को यों आसानी से पक़डने दिया, तो कल से तो आप सिर च़ढ जाओगे। चोरी, जेबकटी, चेनस्नेचिंग, बलात्कार और भी जाने किसकिस केस में निष्ठावान कार्यकर्ताआें को सरेंडर करवाने, गिरफ्तार करने की बातें करने लगोगे। किसकिस को बचाते फिरेगे ? पार्टी कार्यकर्ता का भला तो हमें सबसे पहले देखना प़डता है। ठीक है कि नहीं ?और भगवान कसम, देखिए मैं झूठी कसम कभी नहीं खाता। सच पूछो तो वो अभी इधर कहीं हैं ही नहीं। आज तो हम चाहें तो भी पेश नहीं कर सकते । केस हुआ था उसी दिन से उनकी इच्छा दर्शन करने जाने की थी। आप तो जानते हो धर्म में कितना विश्वास है उनका ! तो इस्तीफा देकर एकदम से चल दिए। सच, उधर हैं ही नहीं। लौटेंगे तो बताऊंगा ना। आखिर मर्डर का केस है। पार्टी बर्दाश्त थ़ोडे ना करेगी। आप बिल्कुल चिन्ता ना करें। - रोमेश जोशी

सीरियल निर्माता की एक सुबह (Serial Nirmaataa kee ek Subah)

उस दिन शूटिंग दोपहर से थी। निर्माता के सारे सीरियलों के निर्देशक और लेखक लोग ड्राइँग रूम में बैठे निर्माता के बाहर आने का इंतजार कर रहे थे। निर्माता के दिखाई देते ही उन्होंने एक झटके में खड़े होकर उसका स्वागत किया। सबने हाथ जोड़े। निर्माता ने किसी को जवाब नहीं दिया। वह मध्य में रखी किसी संत की मूर्ति के सामने गया। अगरबत्ती जलाई। नमन किया,फिर उन सबके बीच रखी विशेष कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।
बाकी सब भी बैठ गए। जिसकी ओर बैठने का इशारा किया था, बात उसी निर्देशक नंबर-एक से शुरू हुई 'मुझे लगता है कि आप मेरे बच्चों को भूखा मार देना चाहते हैं।'
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'ऐसी क्या बात हो गई सर?'
'क्या नहीं हो गई?' निर्माता ने झल्लाकर कहा और जवाब में सबके सिर नीचे झुक गए। निर्माता ने आगे कहा, 'आप सबको पता है, हमें इन कहानियों को दस-दस हजार एपिसोड तक खींचना है। अगले बीस साल तक मैं इनका निर्माता रहूँगा। मेरे मरने के बाद मेरे बेटे इनके निर्माता होंगे। वे लोग तय करेंगे कि दस हजार से आगे कैसे बढ़ाना है। और आप हैं कि लगता है पाँच-दस साल में ही इन सारी कहानियों को पूरी कर देना चाहते हैं।'
'ऐसा तो नहीं है सर।' एक लेखक ने बोलने की हिम्मत की।
'क्या खाक नहीं है।' निर्माता ने दहाड़कर कहा, 'मैं पूछता हूँ पिछले तीन एपिसोड से कहानी डेढ़-डेढ़ इंच कैसे आगे बढ़ रही है?'
निर्माता के सवाल के जवाब में निर्देशक नंबर एक ने घूरकर लेखक से कहा, 'जवाब आप दीजिए।'
लेखक ने पहले सिर नीचा किया, फिर कहा- 'वह मुझसे भूल हो गई। सेंटीमीटर को इंच समझ बैठा। और मैंने कहानी डेढ़ इंच...।'
अन्य लेखकों और निर्देशकों की हँसी के बीच निर्माता ने नाराजी जारी रखते हुए निर्देशक से पूछा, 'लेकिन आप क्या कर रहे हैं? यही लापरवाही तो मुझे खा जाएगी। कल को दर्शक कहानी आगे बढ़ाने की अपेक्षा करने लगेंगे तो हम क्या करेंगे? और आप?'
निर्माता ने नंबर-दो निर्देशक की ओर रुख किया और कहा, 'पिछले चार एपिसोड से आपके हीरो ओर हीरोइन एक बार भी नहीं रोए हैं।'
'लेकिन सर, हम उनके माँ-बाप और भाई-बहनों को,यहाँ तक कि पड़ोसियों को भी रुला रहे हैं।'
'उससे बात नहीं बनती, अगर आप हीरो-हीरोइन को नहीं रुला सकते तो ऐसा कहिए।' मैं जानता हूँ उसके बाद मुझे क्या करना है।
'नहीं-नहीं जी,आगे से शिकायत नहीं आएगी।'उनमें से एक ने कहा,जो हवा का रुख देखकर बोलना जानता था,लेकिन अभी भी कुछ बाकी था। निर्माता ने तीसरे की ओर देखकर कहा, 'और आप,आपके सीरियल में कुल बाईस पात्र हैं। उनमें पाँच पात्र अभी तक एक बार भी नहीं रोए। मैं आप दोनों को आखिरी बार हिदायत दे रहा हूँ। हर 15 एपिसोड में कहानी के हर पात्र को रुलाना है। मैं नहीं जानता आप उन्हें कैसे रुलाते हैं।'
उनमें से एक लेखक जो कुछ नया था, उसने हिम्मत के साथ प्रश्न किया,'लेकिन सर हमारी सारी कहानियों के सारे पात्र करोड़पति बल्कि अरबपति हैं,फिर भी हर पंद्रह एपिसोड में उन्हें रुलाना बड़ा अजीब लगता है।'
'यह सब सोचना आपका काम नहीं है। आप सिर्फ लेखक हैं, जैसा आपको बताया जाता है लिखते जाइए।'कहकर लेखक को चुप करते हुए निर्माता ने चौथे की ओर देखकर सवाल किया, 'क्योंजी वह जो आपका हीरो है,वह बारबार मुझसे मिलने का समय क्यों माँग रहा है?'
'शायद पेमेंट का मामला है।' निर्देशक के जवाब पर निर्माता 'हूँ 'कहकर कुछ देर के लिए चुप हो गया,फिर बोला,'अगले दो एपिसोड में उसका एक्सिडेंट करवाकर लाश गायब करवा दीजिए, फिर देखेंगे। ठीक है अब आप लोग जा सकते हैं,लेकिन ध्यान रहे आगे से कहानी डेढ़ सेंटीमीटर से ज्यादा आगे नहीं बढ़नी चाहिए।'
और आप-हम देख रहे हैं,अब किसी एपिसोड की कहानी आगे नहीं बढ़ती। – रोमेश जोशी

भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में सहयोग ( Brashtaar Virodhee Abhiyaan Mein Sahyog


आज मैं धन्य हो गया। खुद अपनी पीठ थपथपाने को मन कर रहा है। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में कुछ तो सहयोग कर पाया। उनकी पार्टी सरकार चला रही है, आप तो जानते हैं ऐसे लोगों के पास आइडिए की और आइडिए देने वालों की कोई कमी नहीं रहती। फिर भी अपनी किस्मत कि वे मेरे पास आए और मैंने एक-एक कर ऐसे आइडिए उनके सामने रखे कि वे प्रसन्न हो गए। शायद पिछले दिनों मेरे द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध लिखे जोरदार लेख से प्रभावित होकर वे मेरे पास आइडिया लेने आए थे। खैर, पिछले कुछ समय में मेरे बेवकूफी करने के स्तर में कुछ बदलाव आया है। लिहाजा मैंने पहला सुझाव दिया, आप भ्रष्टाचार के विरुद्ध नगर के युवक-युवतियों की एक गरबा प्रतियोगिता क्यों नहीं करवाते। उछल पड़े वे। उत्साह से बोले, ये हुआ न सुझाव।



इसी कारण तो हम लोग आपकी लेखनी के कायल हैं। मैंने आगे कहा, यातायात में अड़चन तो आएगी, पर शहर में आठ-दस जगह माता का जागरण और भण्डारा किया जा सकता है। पार्टी समर्थक कलाकारों की भजन-संध्या और शाम-ए-गजल के आयोजन हो सकते हैं। हां, ये अच्छा है। इसमें तो टिकिट और फ्री-पास की भी बिक्री की जा सकती है। फिर मैंने अगला विचार प्रस्तुत किया,भ्रष्टाचार के विरुद्ध सारे स्कूल और कॉलेजों की ड्राइंग कम्पिटीशन क्यों नहीं रखते आप?
एक पोस्टर प्रतियोगिता हो सकती है और प्रतियोगिता में जो पोस्टर पुरस्कृत हो उसे बड़े पैमाने पर छापने का आपके नेताजी के ही विभाग से आर्डर प्राप्त किया जा सकता है।
मेरे द्वारा दिए गए सुझावों में कमाई की ईमानदार संभावनाओं को देखते हुए उनके चेहरे के प्रशंसा भाव लगातार बढ़ते जा रहे थे। मेरे हर सुझाव से वे सहमत दिखाई दे रहे थे, तभी मुझे लगा इतने सुझावों के कारण वे हांफने लगे हैं। उनमें से एक ने तो हाथ उठाकर मुझे रुकने का भी इशारा किया। लेकिन तभी मैंने उन्हें सुझाव दिया, आप लोग हर शहर,गांव को शामिल करते हुए एक पतंगबाजी प्रतियोगिता का भी आयोजन कर सकते हैं।
बस-बस लेखकजी, इतने सुझाव काफी हैं, इन्हें पूरे करते हुए तो अगले चुनाव आ जाएंगे। यह कहकर वे लोग उठ गए। गदगद मुद्रा में मैंने उन्हें विदा किया। जाते हुए वादा भी करवा लिया कि मेरे अनुरोध पर वे किन्ही दो लोगों के तबादले करवा देंगे। अस्तु, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में अपने सराहनीय सहयोग पर पुलकित मुद्रा में खुद को शाबाशी देते हुए, अब में सोच रहा हूं, पता लगा लूं आजकल तबादलों के रेट क्या चल रहे हैं। आपको पता है क्या? - रोमेश जोशी

फिकर नॉट (Fikar NOT)


कहानी शुरू करने से पहले एक जानकारी दे दूँ, हमारे शहर में एक दुकान है ‘घमण्डी लस्सी’। शहर के कई लोग इस लस्सी के दीवाने हैं। ओठों पर ग्लास लगाते ही महसूस होता है जैसे मलाई का दही जमाया गया है। आधा ग्लास लस्सी तो चम्मच से खानी पड़ती है। पहली बार इस दुकान पर जानेवाले को भ्रम हो सकता है कि ‘घमण्डी’ है, शायद अक्खड़पन के साथ लस्सी पेश की जाएगी, "पीना है तो पी, नहीं तो रास्ता नाप।"
लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। सुना है दुकान के संस्थापक का नाम है घमण्डीलाल, जो ऐसा ब्राण्ड-नेम बन चुका है कि बदलना आसान नहीं और अगर बदला तो घाटे का सौदा हो सकता है। स्वाद की मजबूरी कहें या ब्राण्ड-नेम का आकर्षण शहर का हर वह व्यक्ति जो खुद को कुछ खास मानता है,इस दुकान पर जाता ही है। और कॉलेज के लड़के-लड़कियों को तो यह प्रिय मिलन स्थल है। कहानी का थोड़ा सा सम्बन्ध एक मन्त्री से भी है, लेकिन उसकी चर्चा बाद में।

‘घमण्डी लस्सी’
तो अब कहानी शुरू करूँ!
लड़की यानी कहानी की हीरोइन सुन्दर थी। थोड़ी घमण्डी सी लगती थी। शायद यह घमण्ड रूप का था। पढ़े-लिखे होने का भी हो सकता है, क्योंकि दुकानदार परिवार में वह सबसे ज्यादा पढ़ी थी। वैसे कहा जाता है कि पढ़े-लिखे होने का कोई घमण्ड नहीं होता, बल्कि घमण्ड न होना पढ़े-लिखे होने की पहचान मानी जाती है। फिर भी उसे घमण्ड था, तो शायद ऊँचे या सम्पन्न परिवार का होगा।
लड़का लगनशील था। प्रेम के मामले में तो जरा ज्यादा ही लगनशील था। लड़की से इतना डूबकर प्रेम करता कि एक इशारे पर बिछ-बिछ जाता। जिसे कहते हैं जान छिड़कने पर आमादा बल्कि आप समझ लो कि अगर लड़की बोल दे, "जानू, मेरे बालों में गूँथने कि लिए दो तारे ला दो ना,प्लीज।"
तो बन्दा तारों के लिए पूरी मण्डी छान मारे। पता लगाए कि कहीं ‘बाय वन गेट वन फ्री’ की स्कीम तो नहीं चल रही है। फिर ऐसी कुछ जुगत भिड़ाए कि दो तारों के साथ चाँद के कुछ टुकड़े भी उठा लाए और दोनों तारे लड़की की वेणी में लगाते हुए कहे, "लो डीअर, ये चाँद के टुकड़े भी रखो। ऐड़ी, कोहनी पर रगड़ना, देखना चाँद सी चमकने लगेगी।"
क्षमा कीजिए, इतना बताने के बाद अब मुझे लग रहा है, लड़की के जरा घमण्डी होने का कारण उसका दीवाना प्रेमी ही था। सोचिए, ज्यादा कोशिश किए बिना बल्कि बिना कोशिश के ही, किसी लड़की को दिखाने लायक यानी प्रेजेण्टेबल प्रेमी मिल जाए, तो अगले को घमण्ड नहीं हो जाएगा?
गचागच भरी जवानी में चल रहे थे दोनों। लड़की जब देखो तब नखरों का भरा तरकश लिए चलती, तो लड़का हर चितवन पर घायल होने को आतुर रहता। यहाँ अब मुझे लग रहा है, लड़के-लड़की का नाम बता देने में ही कहानी की खैरियत है। तो लड़के का नाम था बनवारी और लड़की का लक्ष्मी, जिसे जुबान की मरोड़ से बचते हुए सब लोग लछमी ही कहते। प्रेमकथा के लिए कितने अन-रोमाण्टिक नाम हैं ना? डार्लिंग लछमी और डीअर बनवारी सुनते ही लगता है, किसी नाटक के कथानक को आगे बढ़ाने वाले नौकर-नौकरानी हों। इसीलिए नाम बताने में मैंने देर लगाई।
प्रेम बरसों से जारी था। जाने कब शुरू हुआ। तीसरी क्लास से साथ पढ़े। एक ही बस में स्कूल जाते। फिर अपने दो-पहिया वाहनों पर कालेज जाने लगे। विषय अलग-अलग थे, लेकिन क्लास के बाद मिलते रहते। केण्टीन में साथ ही बैठते। दोनों के घर भी बस थोड़ी सी दूरी पर थे। बस,इतनी दूर कि ऊपर की मंजिल की खिड़की से जरा सा आगे झुके कि अगले का छज्जा दिखाई दे जाए। लड़के के पिता श्रीवल्लभ की चाट की दुकान और लड़की के पिता मुरलीधर की किराने की। खरीदी के लिए इक-दूजे की दुकान पर लगातार आना-जाना।
ऐसे में यह बताना तो मुश्किल ही है कि दोनों के बीच प्यार कब हो गया? हो सकता है नौ बरस की ऊम्र में हुआ हो, ऐसा तो नहीं हुआ होगा कि सरकारी मानदण्ड का सम्मान करते हुए, दोनों ने तय कर लिया हो कि पूरी तरह बालिग हो जाने के बाद ही प्रेमी-प्रेमिका बनेंगे। जो भी हुआ हो,बस, इतना कह सकते हैं कि बस हो गया। प्यार था, पर प्रेमकथा नहीं थी।
तभी एक दिन बनवारी के अनुरोध पर लछमी घमण्डी-लस्सी पीने चली तो गई, पर नखराली ने दुकान के बाहर खुले में बैठने से मनाकर दिया। बोली, "यहाँ नहीं, लोग घूरते हैं।"
अय्यारों वाले अन्दाज से देखें तो लछमी के इस व्यवहार से निष्कर्ष निकलता है कि वह इस दुकान पर पहले कभी बाहर खुले में बैठकर लस्सी पीने और तथाकथित लोगों द्वारा घूरे जाने का अनुभव ले चुकी थी। प्रेम की डूब में दोनों को ध्यान ही नहीं रहा कि हमारे शहर में गन्ने का रस,कॉफी या लस्सी पीने के लिए कोई लड़का-लड़की बन्द केबिन में बैठें, तो उन्हें पक्के तौर पर प्रेमी-प्रेमिका मान लिया जाता है, जिसकी खबर भले न छपे, पर आसपास फैलती जरूर है।
अस्तु, उन दोनों ने बन्द केबिन में बैठकर लस्सी पी। जैसा कि हमारे शहर के प्रेमी-प्रमिकाओं के बीच परम्परा है, एक-एक ग्लास लस्सी हलक के नीचे उतारने में लछमी और बनवारी को भी डेढ़ घण्टे से ज्यादा ही लग गया। सर्व करनेवाले वेटरों ने इक-दूजे को हलकी सी आँख मारी और सहज प्रेम खबर बनकर एकाएक प्रेमकथा में तब्दिल हुआ।
और आप तो जानते हैं, प्रेमकथा की पहली ही पायदान पर खड़े होते हैं अड़ंगा लगानेवाले। तीन ऑप्शन होते अड़ंगा लगाने के। कहानी को हिंसा की ओर ले जाना हो, तो अड़ंगा कोई गुण्डा यानी विलेन लगाता है। करुणा या नैतिकता का बघार लगाना हो, तो अड़ंगा लड़के या लड़की के किसी पूर्व प्रेमी या प्रमिका द्वारा लगाया जाता है, मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ टाइप।
लेकिन इस कहानी में तीसरे ऑप्शन ने अड़ंगा लगाया। एक से दूसरे मुँह और कान होती हुई चटखारे के साथ घमण्डी-लस्सीपान-मिलन की सूचना तीसरे ऑप्शन यानी लछमी और बनवारी के दुकानदार पिताओं के पास जैसे भी हो पहुँच गई। तुरन्त सख्ती दिखाई लछमी के पिता मुरलीधर ने, "कल से तुम कार में कॉलेज जाओगी-आओगी। उस लड़के से मिलने की कोशिश की, तो पढ़ाई बन्द करवा दूँगा।"
लछमी ने थोड़ा सा विरोध करते हुए समझाना चाहा कि बनवारी तो बचपन से उसका दोस्त है। झूठ बोला कि आप जैसा समझ रहे हैं, वैसा कुछ नहीं है। यह भी बताया कि बनवारी की दोस्ती के कारण ही कॉलेज में और रास्ते पर आते-जाते कोई उसे छेड़ने की हिम्मत नहीं करता। एक तिरछे से वाक्य द्वारा लछमी ने बताना चाहा कि बनवारी पढ़ाई में भी अव्वल है और उसके परिवार का स्तर भी तो हमारे जैसा ही है और इस इशारे को शादी की बात चलाने का इशारा मानते हुए, जिसे कहते हैं आग, उसमें घी पड़ गया। लछमी को पता ही नहीं था कि मुरलीधर इस सड़क पर अपने को श्रेष्ठतम माने बैठे हैं, नीचे स्तर के श्रीवल्लभ के घर बेटी नहीं दे सकते। कुटुम्ब के तीन-चार बच्चे उसी कॉलेज में पढ़ते थे। कड़े स्वर में उन्हें हिदायत दी गई, "नजर रखना, उस बनवारी . . . से मिले नहीं।"
जबकि बनवारी के पिता श्रीवल्लभ ने तरकीब से काम लेते हुए आदेश दिया, "बेटा, कल से आपको पाँच घण्टे दुकान पर बैठना है। अब धीरे-धीरे यह सब तुम्हीं को सम्हालना है। जल्दी ही दुकान के रिनोवेशन का काम भी देखना है।"
मिलन मुहाल हो गया। दूसरे ही दिन से कॉलेज में कोई न कोई हमेशा लछमी के साथ लगा रहता, तो आखिरी पिरियड आते न आते श्रीवल्लभजी बनवारी के मोबाइल की घण्टी बजा देते। सुकून पहुँचानेवाली बात बस इतनी हुई कि बन्दिश के दूसरे दिन बनवारी को अपने वाहन के ब्रेकवायर में कागज की पर्ची फँसी मिली। लिखा था, ‘‘ लस्सी पीना जहर हो गया। बन्दिशें लग गई। मिलने पर रोक, वरना कॉलेज बन्द। पर - फिकर नॉट। हमेशा तुम्हारी - ल।
देखते ही बनवारी जान गया, लछमी प्रिया ने कितनी जल्दबाजी में लिखा है। अनुभवी मजनू की तरह उसने पर्ची को कई बार पढ़ा। अन्त में लिखे ‘फिकर नॉट’ और ‘हमेशा तुम्हारी’ को कलेजे में उतारा। पर्ची को सहेजकर जेब में रखने से पहले ‘फिकर नॉट’ उसका अपना शब्द हो गया।
धौंस पढ़ाई छुड़वा देने की थी, इसलिए दोनों ने छुपकर मिलने का प्रयास नहीं किया। फिर भी किसी फ्री-पिरियड में सहेली के मोबाइल से बात हो जाती। बातों में प्रेम को दोहराने के साथ अड़ंगों का विश्लेषण होता, कसम के साथ रुकावटों को हटाने के मन्सूबे बुने जाते। शान्ति और विरोधहीनता देख दोनों पिताओं को लगा, उन्होंने मैदान मार लिया। अन्य अड़ंगेबाज पिता सबक ले लें, इसलिए बता दूँ - प्रेमकथा में घनघोर शान्ति और विरोधहीनता रुके हुए तूफान, बन्द मुँह के ज्वालामुखी या टाइटेनिक डुबोने वाले आइसबर्ग का पूर्व संकेत होते हैं।
वैसे तो प्रेम की अगन दोनों ही तरफ इक्वल-इक्वल थी, पर कहानी के मान से कहा जाए तो पूरे तीन साल थमी रही प्रेमकथा। दोनों ने पढ़ाई पूरी की। लछमी ने कॉमर्स में टॉप किया और प्रोफेसर बनने के इरादे से एमफिल की ओर कदम बढ़ाए। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में तमाम इनाम पाए, अखिल भारतीय शील्डें जीती। शहर के उभरते हुए आर्थिक-राजनीतिक विश्लेषणकर्ताओं में उसकी गिनती होने लगी। किराने के दुकानदार की आजस्वी भाषण देने वाली बेटी को गोष्ठियों में बुलाया जाने लगा। और इसी बीच बनवारी ने पढ़ाई जारी रखते हुए दुकान का रिनोवेशन भी किया। जो दुकान बरसों से अनाम थी, उसे नाम दिया - फिकर नॉट चाट सेण्टर।
कॉमर्स के जानकारों की मानें तो फिकर नॉट नाम जुबान पर चढ़ने की काबिलियत रखता है। यही हुआ। बिक्री बढ़ी, लोकप्रियता बढ़ी, पढ़ाई पूरी हुई, शहर में ‘फिकर नॉट’ एकाएक ‘घमण्डी’ की तरह ब्राण्डनेम बन गया। बनवारी को अब लोग फिकर नॉटवाले बनवारी के रूप में भी जानने लगे और महत्वपूर्ण पार्टियों में, बैठकों में उसे सादर बुंलाया जाने लगा। स्तर बदला तो चन्दे की आशा की जाने लगी।
लेकिन इस नाम ने प्रेम की सीमेण्ट का भी काम किया। रोज दुकान में प्रवेश करते हुए बनवारी‘फिकर नॉट’ पर एक नजर डालता और मन ही मन कहता, लछमी मेरी है, सिर्फ मेरी, फिकर नॉट। लछमी भी अपनी खिड़की से, कभी घर से बाहर आते-जाते बोर्ड को देखती और बनवारी को याद करती। ‘आह’ जैसा कुछ भरने का तो सवाल ही नहीं था, पर कई बार मुस्कान के साथ खुद से कहती, "वही है मेरी मंजिल, फिकर नॉट।"
चाट के आयटम बदल गए थे या फिर यह बनवारी की कॉलेज की दोस्ती का प्रभाव था कि फिकर नॉट चाट सेण्टर पर आनेवालों में युवावर्ग का बोलबाला हो गया। जो भी यहाँ आता एक बार दुकान के अजीब नाम पर विचार जरूर करता। अनुमान लगाए जाते। लछमी की लिखी ब्रेकवायर में फंसी प्रेम-पर्ची का तो कोई सोच भी नहीं सकता था। लगभग दोस्त बने ग्राहक कभी कहते, "भाई बनवारीजी, अपने शहर के लोगों के स्वभाव के लायक ही नाम रखा है आपने।"
"क्या मतलब? मैं समझा नहीं।" सदा मुस्कुराते बनवारी का प्रतिप्रश्न होता और मस्ती भरा जवाब मिलता, "अरे भई, ये अपने ही शहर का तो चरित्र है, इधर बेटी की भाँवरें पड़ रही हैं और पिताजी पान खाने चले गए, फिकरनॉट।"
फिर भी बनवारी और लछमी के बेहद करीबी दोस्तों-सहेलियों के साथ ही उड़ती चिड़िया के पंख गिनने में माहिर कुछ का अनुमान भी वास्तविकता के करीब पहुचता और वे काउण्टर के पास आकर धीमे स्वर में पूछ ही मारते, "बड़े भइया, ये फिकरनॉट किसी को सन्देश देने के लिए लिखा है ना?"
जवाब में बनवारी की ओर से जो मुस्कान परोसी जाती, उससे ग्राहक का चटखारा और बढ़ जाता।
जिन्दगी-फेक्ट्री के तमाम उत्पादनों में प्रेम सबसे कम खर्चीला होते हुए भी सबसे लोकप्रिय ब्रेण्ड नेम है और हर प्रेमी-प्रमिका उसके स्थाई ब्रेण्ड एम्बेसेडर। तीन साल से ज्यादा हो गए, फिकर नॉट की प्रेमकथा रुकी रही, कदम-ताल करती रही। जमीन से चिपकी यानी डाउन टू अर्थ और सीधी-सपाट प्रेमकथा में यही सबसे बड़ा फायदा है। जमीन तो आप जानो कि क्षितिज पर जाकर गोल घूम जाती है, पर निपट सीधी होने के कारण प्रेमकथा धरती छोड़ आसमान की ओर उठ जाती है। यही हुआ इस फिकर नॉट प्रकरण में भी।
लछमी कभी ‘फिकर नॉट’ पर चाट खाने नहीं गई, पर उस घटना के बाद उसने ‘घमण्डी’ की ओर भी रुख नहीं किया। पर लोकप्रियता के आलम में कहें या फिर इसे मेघदूत की तर्ज पर चाट-दूत कहना होगा, दोस्त और सहेलियाँ फिकर नॉट से पार्सल बँधवाते और लछमी के छज्जे पर बैठकर ठिठोली करते हुए खाते सन्देश पहुँचा देते। शहर में कभी किसी बड़ी समस्या पर परिचर्चा आयोजित होती तो लछमी का भाषण बनवारी पिछली सीट पर बैठकर सुनता, अच्छे भाषण के लिए बधाई का एसएमएस भेजता। फिर एक दिन एक पारिवारिक पार्टी में तो यह भी हो गया कि लछमी के पिताश्री यानी मुरलीघर ने दहीबड़े या किसी ओर चीज की तारीफ कर दी और सुनने को मिला, "अरे साब, आप क्या तारीफ कर रहे हैं! यह सब तो आपके बनवारीजी की केटरिंग का ही कमाल है।"
सुनकर पास खड़ी लछमी ने मुस्कुराकर सिर दूसरी दिशा में क्या घुमाया, मुरलीधर पिता-सुलभ चिन्ता में डूब गए। शायद थोड़ी आशंका पहले से रही होगी, तभी तो झट से संकेत पकड़ लिया कि बनवारी-लछमी प्रणय-चेप्टर के अन्त में दी-एण्ड नहीं क्रमशः लिखा है। टू बी कण्टीन्यूड का कुछ हिस्सा ऐसा है, जिसे वे खुद को सजग मानने के बावजूद नहीं जानते, इसलिए जल्दी ही कुछ करने की जरूरत महसूस हो गई। और श्रीवल्लभ को यही एहसास उस दिन हुआ जिस दिन लछमी की बर्थ-डे पार्टी का सारा सामान उनकी ही दुकान से गया और फिर बनवारी भी काफी देर के लिए काउण्टर से गायब हो गया।
उम्र बढ़ रही थी। माफ कीजिए, जवानी में उम्र बढ़ती नहीं, शादी के लायक हो जाती है। ऐसे में दोनों की शादी की बात चलना स्वाभाविक था। गलत मत समझना, बनवारी और लछमी की आपस में शादी की बात चलने का तो सवाल ही नहीं उठा। शादी की बात चली बनवारी की ऐसी लड़कियों के लिए जिनके पिता लाखों का दहेज दे रहे थे। बात चली लछमी की जिसे बड़े परिवारवालों ने माँगा था, सुना है, लड़की के गुणों को देखते हुए दहेज की माँग बहुत ही कम कर दी थी।
अब यहाँ आई कहानी की दूसरी पायदान, जहाँ लड़का और लड़की दोनों अपनी जगह सफल थे,परिपक्व थे यानी कमजोर नहीं मजबूत थे और अड़ंगों के बीच प्रेम करके दुःखी होने वालों को प्रेरक सन्देश दे रहे थे कि सफलता का मुकाम हासिल होने के बाद आपकी हर किसी लप्पन-छप्पन से शादी करवाना पिताओं के बूते वे बाहर हो जाता है, फिर वे चाहे जितने आदरणीय पिताश्री क्यों न हों।
आप्त-कथन यह भी है कि अगर आप किसी से अटाटूट प्रेम कर रहे हों, तो फिर अन्य लड़कियाँ आपकी फेसबुक पर नापसन्द की सूची में दर्ज होती जाती हैं। एक-एक कर तमाम रिश्ता-प्रस्तावों को रिजेक्ट करते हुए फिकर नॉट को ब्राण्डनेम बना चुके, सफलता की सीढ़ी पर खड़े बनवारी ने एक दिन किसी प्रस्ताव को मान लेने के लिए बहस करते पिता से कहा, "आप जरा एक बार लछमी के लिए बात तो कीजिए।"
"उस कंगाल से? पच्चीस लाख मुरली का बाप भी नहीं दे सकता।" तमक कर जवाब दिया श्रीवल्लभ ने और व्यापारी-पुत्र बनवारी ने - आपको मण्डी में मेरी बोली लगाने का कोई हक नहीं है। लछमी नहीं मिली तो मैं जान दे दूँगा। पैसे को भगवान मत मानिए, दहेज लेंगे तो मैं शादी ही नहीं करूँगा, जैसा एक भी फिल्मी डॉयलॉग नहीं मारा, क्योंकि वह जानता था, आजन्म दुकानदार पिता के आगे पैसे की निरर्थकता के सारे तर्क बेमतलब होते हैं। गचागच तर माल खाते, पैर दबवाते साधु-सन्तों की पीढ़ियाँ खप चुकी हैं और आगे भी खपती रहेंगी यही प्रयास करते।
बनवारी ने सारे विवाह प्रस्ताव रिजेक्ट कर दिए। लछमी ने भी लड़कों के ऐब गिना दिए। माना कि लड़की में शादी के प्रस्ताव को रिजेक्ट करने का उतना दम नहीं होता, लेकिन प्रेमकथा में ऐब भी कई बार गुण बन जाते हैं। मैंने बताया ना, लड़की जरा धमण्डी थी। उसकी यही अदा काम आई उन एक-दो मामलों में, जहाँ शादी की उत्सुक पार्टी लड़की पसन्द करने घर चली आई थी। पूछे गए प्रश्नों पर लछमी ने प्रतिप्रश्न क्या कर डाले, मामला फिस्स हो गया। देखने वाले वापस ही नहीं गए, उन्होंने दस घरों में जाकर लछमी के घमण्ड की चर्चा भी कर दी।
परिपक्वता ने दोनों को सीख दी, अड़ंगेवालों से डरो मत, भागो मत, घबराओ भी मत, धीरज धरो,बस, किसी भी तरह से उनके प्रस्तावों को टालते, अस्वीकार करते चलो। फिर प्रेम नामक ब्रेण्डनम की यह भी तो खासियत है कि कोशिश करनेवालों की ऊपरवाला मदद करता है। मोबाइल-चर्चा दोनों के बीच अभी भी होती रहती। एक-दूसरे के पिता की शर्ताें की दोनों को जानकारी थी। अब यहाँ आती है प्रेमकथा की तीसरी पायदान, जिसे कहते हैं, चांस या भाग्य। अगर इसे ऊपरवाले का भेजा अवसर कहा जाए तो मुझे कोई आपत्ति नहीं, पर देखिए, वह कैसे भुन गया।
बात तब की है, जब नए-नए चुनाव हुए थे और चुनाव के बाद नए मन्त्रीमण्डल ने शपथ ली थी। उन्हीं दिनों शहर की प्रसिद्ध फर्म घमण्डी लस्सी वालों के यहाँ शादी का रिसेप्शन था। बनवारी और लछमी के व्यापारी पिताओं को सपरिवार आमन्त्रण था। यहीं पर अर्से बाद बनवारी और लछमी मिले, तो लछमी ने घमण्डियों की ओर इशारा कर कहा, "हमारी शादी में तो रुकावट डाल दी और खुद . . . ।"
हँसते हुए दोनों दूर चले गए। श्रीवल्लभ के सामने पड़ते ही लछमी ने पैर छुए। अचकचाते हुए श्रीवल्लभ ने आशिर्वाद दिया और लछमी वहीं चुपचाप खड़ी हो गई। व्यापारियों के बीच उसी दिन हुए मन्त्रियों के विभागों के बंटवारे पर चर्चा चल रही थी। नए खाद्य मन्त्री को लेकर टिप्पणियाँ हो रही थी। बढ़-चढ़कर तारीफ करनेवाले कुछ लोग हर तरह से जता रहे थे कि वे खाद्यमन्त्री को निजी तौर पर जानते हैं। बेगानी शादी में उद्योगपति और व्यापारी ऐसी ही बातें तो करते हैं।
यहीं पर बड़ों के बीच चर्चा में कूदते हुए लछमी ने ऐसा कुछ कह दिया कि सब चुप होकर उसकी ओर देखने लगे। यह भी हुआ कि उसकी बात से सहमत-असहमत होने के बजाय व्यापारी समूह छिटक गया। और बनवारी के पिता उस लड़की को देखते रह गए, जिस पर उनका सफल किन्तु नादान बेटा दीवाना था।
बनवारी और लछमी ने जब घटना का विश्लेषण किया तो निष्कर्ष निकला कि दहेज की तो शिकायत थी ही, घर की बहू के रूप में श्रीवल्लभजी को लछमी शायद बड़बोली भी लगी होगी। यह तो चार महीने बाद पता चला कि मन्त्री के बारे में तीखी बात करके उस दिन लछमी ने सामने आए अवसर को भुना लिया, जब एक दिन पूरे परिवार के बीच श्रीवल्लभजी ने बेटे के मुँह में मिठाई ठूँसते हुए कहा, "खुश हो जा, तेरी शादी तय करके आया हूँ। शाम को ‘रोका की रस्म’ करने चलना है।"
बनवारी के चेहरे का रंग उतरा देख उन्होंने तुरन्त स्पष्टीकरण दिया, "घबराए मत, लछमी से ही कर रहा हूँ तेरी शादी।"
फिर हँसी की लहर के बीच सबको मिठाई बाँटते हुए उन्होंने बताया, "तुम लोगों को बताए बगैर चला गया था। पता नहीं, वो लोग मना कर देते तो। पर सबको मनाकर ही लौटा। शाम को चलने की तैयारी करो।"
रोका हो गया। शादी की तारीख तय हो गई है। मिलने पर अब रोक नहीं है। दोनों घरों में आना-जाना शुरू हो गया है। लेकिन यह रहस्य अब तक नहीं खुला कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि श्रीवल्लभ बिना दहेज की शादी के लिए मान गए? वो कैसा अवसर था, जो उस दिन ‘घमण्डी’ की शादी में लछमी ने भुनाया। श्रीवल्लभ बार-बार ‘गुणी बहू’ कहकर लछमी की तारीफ करते हैं और साथी व्यापारी उनका साथ देते हैं, तो लछमी कुछ अनुमान लगा लेती है। लछमी के अनुमान से बनवारी भी सहमत है।
अब यहाँ आकर कहानी का अन्त होना था कि आजकल श्रीवल्लभ बनवारी और लछमी के बीच विचार चल रहा है कि बदली परिस्थितियों में दुकान का नाम ‘फिकरनॉट’ के बजाय ‘लछमी चाट सेण्टर’ कर दिया जाए। घर के अन्य सदस्य बनवारी से मजाक कर रहे हैं, "शादी के बाद तो बनवारी भैया, लड़के को फिकर ही फिकर करना होता है, अब काहे का फिकरनॉट।"
लेकिन श्रीवल्लभ के हृदय परिवर्तन का रहस्य जाने बगैर आप मानेंगे नहीं कि कहानी पूरी हो गई है। तो सुनिए, उस दिन व्यापारियों की चर्चा में लछमी के अन्दर का विश्लेषक एकाएक जागृत होकर बोल पड़ा था, "ये जो नए खाद्यमन्त्री हैं ना! ये तेल और शकर लॉबी के मित्र हैं। उन्हीं के बल पर चुनाव जीते हैं। देख लेना, तेल और शकर के भाव जल्दी ही आसमान छूएँगे। चाहें तो आप भी लाभ उठा सकते हैं।"
लछमी का अनुमान है, श्रीवल्लभजी ने, शायद उनके साथियों ने भी लाभ ले लिया। जो भी हुआ हो, इस कहानी से व्यापारी पिताओं को इतना सबक तो ले ही लेना चाहिए कि दहेजवाली बहू से गुणी बहू लाख गुना बेहतर है। और बहू के गुणी होने का एक प्रमाण यह भी है कि लछमी ने अपने होने वाले पति और ससुर से साफ कह दिया है, "घमण्डी की ही तरह ‘फिकरनॉट’ भी एक ब्राण्डनेम बन चुका है। हम उसे कभी नहीं बदलेंगे।" - रोमेश जोशी